झज्जर: गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर (GI कैंसर) वे कैंसर हैं जो पाचन तंत्र के विभिन्न अंगों जैसे भोजन नली (इसोफेगस), पेट, लिवर, पैंक्रियाज, छोटी आंत, कोलन, रेक्टम और गुदा में शुरू होते हैं। ये कैंसर आमतौर पर 50 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में अधिक देखे जाते हैं, लेकिन कुछ जोखिम कारकों के कारण कम उम्र में भी हो सकते हैं।
अच्छी बात यह है कि इनमें से कई कैंसर का समय रहते पता लगाया जा सकता है, जिससे इलाज के परिणाम बेहतर होते हैं और जीवन बचाने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए शुरुआती लक्षणों के प्रति जागरूक रहना और नियमित स्क्रीनिंग करवाना बेहद महत्वपूर्ण है।
मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, शालीमार बाग के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के एसोसिएट डायरेक्टर एवं यूनिट हेड डॉ. अनादी पचौरी ने बताया “कोलोरेक्टल कैंसर, जो कोलन या रेक्टम में होता है, भारत में काफी सामान्य है। इसके लक्षणों में बार-बार दस्त या कब्ज, मल में खून, पेट दर्द, बिना कारण वजन कम होना और कमजोरी शामिल हैं। 50 वर्ष से अधिक उम्र, परिवार में कैंसर का इतिहास, मोटापा, धूम्रपान, कम फाइबर वाला आहार और आंतों की पुरानी सूजन इसके प्रमुख जोखिम कारक हैं। कोलोनोस्कोपी जांच के माध्यम से इस कैंसर को शुरुआती अवस्था में पकड़ा जा सकता है और कैंसर बनने से पहले पॉलिप्स को हटाकर इसे रोका भी जा सकता है। पेट का कैंसर, जिसे गैस्ट्रिक कैंसर भी कहा जाता है, पेट की अंदरूनी परत में विकसित होता है। इसके लक्षणों में लगातार एसिडिटी, अपच, पेट दर्द, मतली, उल्टी, भूख कम लगना और वजन कम होना शामिल हैं। यह कैंसर अक्सर H. pylori संक्रमण, धूम्रपान, अधिक शराब सेवन और पारिवारिक इतिहास से जुड़ा होता है। उच्च जोखिम वाले लोगों में एंडोस्कोपी जांच और H. pylori संक्रमण का इलाज इस कैंसर के जोखिम को कम कर सकता है। जिन लोगों के परिवार में कैंसर का इतिहास है, उनके लिए जेनेटिक काउंसलिंग भी उपयोगी हो सकती है।
डॉ. अनादी ने आगे बताया “इसोफेगल कैंसर भोजन नली में होता है और भारत में तंबाकू और शराब के सेवन के कारण इसका खतरा अधिक है। इसके मुख्य लक्षणों में निगलने में कठिनाई, छाती में दर्द, आवाज में बदलाव, वजन कम होना और भोजन का वापस आना शामिल हैं। इसी तरह लिवर कैंसर अक्सर हेपेटाइटिस B या C संक्रमण, सिरोसिस, फैटी लिवर और अत्यधिक शराब सेवन के कारण होता है। इसके लक्षणों में पीलिया, पेट में सूजन या दर्द, थकान और वजन कम होना शामिल हैं। हेपेटाइटिस B का टीकाकरण, समय पर इलाज और हाई-रिस्क लोगों में नियमित अल्ट्रासाउंड जांच से इस कैंसर को रोका या शुरुआती अवस्था में पकड़ा जा सकता है। पैंक्रियाज का कैंसर अक्सर देर से पता चलता है क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण स्पष्ट नहीं होते। इसके लक्षणों में पीलिया, पेट या पीठ में दर्द, भूख कम लगना, अचानक वजन कम होना और कमजोरी शामिल हैं। धूम्रपान, मोटापा, डायबिटीज, पारिवारिक इतिहास और पुरानी पैंक्रियाज की बीमारी इसके प्रमुख जोखिम कारक हैं। ऐसे किसी भी लक्षण को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तुरंत डॉक्टर से जांच करवानी चाहिए।“
गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर से बचाव के लिए स्वस्थ जीवनशैली अपनाना बेहद जरूरी है। संतुलित आहार जिसमें फल, सब्जियां और साबुत अनाज शामिल हों, नियमित व्यायाम, वजन नियंत्रण, तंबाकू से दूरी और शराब का सीमित सेवन जोखिम को कम करता है। इसके अलावा हेपेटाइटिस B और HPV का टीकाकरण, समय-समय पर कोलोनोस्कोपी जैसी स्क्रीनिंग जांच, H. pylori और हेपेटाइटिस संक्रमण का इलाज, और परिवार में कैंसर का इतिहास होने पर जेनेटिक काउंसलिंग करवाना भी महत्वपूर्ण है। यदि मल में खून, लगातार पेट दर्द या बिना कारण वजन कम होने जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।
संक्षेप में, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर को काफी हद तक रोका जा सकता है या शुरुआती अवस्था में पकड़ा जा सकता है। नियमित स्क्रीनिंग, सही जीवनशैली, समय पर टीकाकरण और किसी भी असामान्य लक्षण की अनदेखी न करना, कैंसर के खतरे को कम करने और सफल इलाज सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शुरुआती पहचान से इलाज अधिक प्रभावी होता है और मरीज के स्वस्थ जीवन की संभावना काफी बढ़ जाती है।

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