वाराणसी: पिछले कुछ वर्षों में न्यूरोसर्जरी के क्षेत्र में स्पाइन से जुड़ी बीमारियों के इलाज में उल्लेखनीय बदलाव आया है। पहले “स्पाइन सर्जरी” का नाम सुनते ही मरीजों के मन में डर पैदा हो जाता था। पारंपरिक सर्जरी में बड़े चीरे लगाने पड़ते थे, अस्पताल में लंबे समय तक रहना पड़ता था और रिकवरी के दौरान काफी दर्द होता था। आज मिनिमली इनवेसिव स्पाइन सर्जरी (MISS) के विकास ने स्पाइन के इलाज के तरीके को काफी बदल दिया है। कई पारंपरिक ओपन सर्जरी की जगह अब छोटे चीरे, एडवांस टेक्नोलॉजी और अधिक आरामदायक रिकवरी वाली तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नोएडा के न्यूरोसर्जरी विभाग के एसोसिएट डायरेक्टर एवं यूनिट हेड डॉ. प्रांकुल सिंघल ने बताया “जब क्षतिग्रस्त डिस्क या हड्डी का बढ़ा हुआ हिस्सा स्पाइनल कॉर्ड की नाजुक नसों पर दबाव डालता है, तो कमर या पीठ में तेज दर्द, हाथ-पैरों में सुन्नपन, झनझनाहट या कमजोरी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। यदि फिजिकल थेरेपी, आराम और दवाओं से राहत नहीं मिलती, तो दबाव में आई नस को मुक्त करने और मरीज की क्वालिटी ऑफ लाइफ बेहतर करने के लिए सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। पारंपरिक “ओपन” स्पाइन सर्जरी में सर्जन को पीठ पर अपेक्षाकृत बड़ा चीरा लगाना पड़ता है और प्रभावित हिस्से तक पहुंचने के लिए मांसपेशियों को स्पाइन से अलग करना पड़ता है। इसे इस तरह समझ सकते हैं जैसे घर में सिर्फ एक लीकेज पाइप को ठीक करने के लिए पूरी दीवार तोड़नी पड़े।
डॉ. प्रांकुल ने आगे बताया “मिनिमली इनवेसिव स्पाइन सर्जरी ने इस पूरी प्रक्रिया को बदल दिया है। इसमें लंबे चीरे की जगह बहुत छोटा चीरा लगाया जाता है, जो अक्सर एक सिक्के से भी बड़ा नहीं होता। इसके बाद एक विशेष उपकरण, जिसे ट्यूब्यूलर रिट्रैक्टर कहा जाता है, का इस्तेमाल किया जाता है। इस पतली ट्यूब को त्वचा के रास्ते स्पाइन तक सावधानी से पहुंचाया जाता है।
MISS में पीठ की मांसपेशियों को काटने या उन्हें हड्डी से अलग करने की जरूरत कम होती है, इसलिए मरीजों को इसके कई फायदे मिलते हैं। सर्जरी के बाद दर्द काफी कम होता है और दर्द की दवाओं की जरूरत भी कम पड़ती है। ब्लड लॉस न्यूनतम होता है और इंफेक्शन का जोखिम भी काफी कम हो जाता है।
MISS एक बेहद एडवांस तकनीक है, लेकिन सर्जरी केवल किसी स्ट्रक्चरल समस्या को ठीक करने का एक माध्यम है। स्पाइन को लंबे समय तक स्वस्थ बनाए रखने के लिए हमारी लाइफस्टाइल महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। रिकवरी के शुरुआती दिनों में वॉक करना सबसे अच्छी थेरेपी में से एक है। पूरी तरह ठीक होने के बाद शरीर का स्वस्थ वजन बनाए रखना और कोर मसल्स को मजबूत करना जरूरी है, ताकि रोजमर्रा की गतिविधियों के दौरान स्पाइन पर पड़ने वाला दबाव कम किया जा सके।


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