नेपाल के रसुवा, नुवाकोट और धादिंग जिलों में बाढ़ का असर सबसे अधिक देखा गया है। त्रिशूली नदी और उससे जुड़ी नदियों के किनारे स्थित कई घर, सड़कें, पुल, वाहन और ऊर्जा परियोजनाएं पानी व मलबे में बह गईं या क्षतिग्रस्त हो गईं। नदी के तेज बहाव ने कुछ ही समय में पूरे इलाकों का स्वरूप बदल दिया। कई स्थानों पर बिजली, संचार और सड़क संपर्क टूट गया है, जिससे राहत एवं बचाव कार्य कठिन हो गया है।
ल्हेंडे नदी घाटी से शुरू हुई तबाही
रिपोर्टों के अनुसार, हादसे की शुरुआत नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में हुई। उपग्रह तस्वीरों के प्रारंभिक विश्लेषण से संकेत मिला है कि लगभग 5,200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर का निचला हिस्सा टूटकर घाटी में गिरा। बर्फ और चट्टानों का यह विशाल ढेर नीचे गिरते समय मलबे को साथ ले आया और ल्हेंडे नदी के रास्ते विनाशकारी बहाव पैदा हुआ। इसके बाद नदी में अस्थायी रुकावट बनी और उसके टूटने पर पानी, कीचड़ तथा चट्टानों का सैलाब तेजी से निचले इलाकों में फैल गया।
विशेषज्ञों और अधिकारियों की शुरुआती आशंका थी कि भूकंप ने इस घटना को जन्म दिया होगा। हालांकि, अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार जो भूकंपीय संकेत दर्ज हुए, वे संभवतः ग्लेशियर, चट्टान और मलबे के बड़े पैमाने पर गिरने से पैदा हुई ऊर्जा के कारण थे, न कि किसी अलग भूकंप के कारण। इस घटना की वैज्ञानिक जांच जारी है और अंतिम कारणों की पुष्टि अभी बाकी है।
गांव, सड़कें और पुल बहे
बाढ़ का पानी ल्हेंडे खोला से भोटेकोशी और फिर त्रिशूली नदी की ओर बढ़ा। रिपोर्टों के मुताबिक, त्रिशूली नदी का जलस्तर बहुत कम समय में कई मीटर तक बढ़ गया। तिमुरे और स्याफ्रु बेसी सहित रसुवा जिले की कई बस्तियां बुरी तरह प्रभावित हुईं। आगे नुवाकोट और धादिंग के हिस्सों में भी मकानों, सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा।
कम से कम 19 पुलों और लगभग 40 किलोमीटर सड़क के बह जाने या क्षतिग्रस्त होने की सूचना है। बाढ़ से जलविद्युत परियोजनाओं को भी नुकसान पहुंचा है, जिससे प्रभावित क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति बाधित हुई। चीन की सीमा से जुड़े ग्यिरोंग पोर्ट क्षेत्र में भी सड़क, बिजली और संचार संपर्क प्रभावित होने की खबर है।
सैकड़ों पर्यटक और स्थानीय लोग लापता
इस आपदा में स्थानीय निवासियों के साथ बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक और तीर्थयात्री भी प्रभावित हुए हैं। प्रभावित क्षेत्र कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग और गोसाईकुंड ट्रेकिंग क्षेत्र के नजदीक है, जहां इस समय तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की आवाजाही रहती है। नेपाल के अधिकारियों के अलग-अलग शुरुआती आंकड़ों में 400 से अधिक पर्यटकों के लापता होने की बात सामने आई है, जिनमें बड़ी संख्या विदेशी नागरिकों की है।
कुछ रिपोर्टों में नेपाल की ओर से 484 लोगों के लापता होने की सूचना दी गई है, जिनमें 391 विदेशी और 93 नेपाली शामिल हैं। वहीं तिब्बत में भी सैकड़ों लोगों के लापता होने की खबर है। ऐसे में सीमा के दोनों ओर लापता लोगों की कुल संख्या 700 से अधिक हो सकती है। बचाव दलों को आशंका है कि पानी घटने और दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंच बनने के बाद नुकसान का वास्तविक पैमाना और स्पष्ट होगा।
राहत और बचाव अभियान तेज
नेपाल सेना, पुलिस, स्थानीय प्रशासन और आपदा-राहत दल हेलीकॉप्टर, ड्रोन और खोजी कुत्तों की मदद से लोगों को ढूंढने और सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने में जुटे हैं। लेकिन तेज नदी प्रवाह, घना मलबा, टूटे हुए रास्ते और खराब मौसम राहत कार्य में बड़ी बाधा बन रहे हैं। कई जगह हेलीकॉप्टरों का उतरना भी संभव नहीं हो पा रहा है।
घायलों को स्थानीय अस्पतालों और काठमांडू के अस्पतालों में भेजा जा रहा है। प्रभावित नदी किनारे के इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी गई है। भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ नदी तटीय क्षेत्रों में भी सतर्कता बढ़ाई गई है, क्योंकि नेपाल की नदियों का पानी आगे मैदानी इलाकों की ओर बहता है।
जलवायु संकट पर फिर चर्चा
वैज्ञानिक इस बात की जांच कर रहे हैं कि ग्लेशियर टूटने की इस विशेष घटना में जलवायु परिवर्तन की कितनी भूमिका रही। फिलहाल किसी एक घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से जल्दबाजी होगी। फिर भी, हिमालय क्षेत्र में बढ़ते तापमान, तेजी से पिघलते ग्लेशियरों और अस्थिर पर्वतीय ढलानों को गंभीर जोखिम के रूप में देखा जा रहा है।
नेपाल की यह त्रासदी पर्वतीय क्षेत्रों में बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणाली, सुरक्षित यात्रा प्रबंधन, नदी घाटी निगरानी और आपदा-तैयारी की तत्काल जरूरत को रेखांकित करती है। फिलहाल राहत कार्य जारी है और हजारों परिवार अपने प्रियजनों की सुरक्षित वापसी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।


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