नरोदा / गांधीनगर, 8 अक्टूबर 2026: आंखों की सेहत को अक्सर तब तक गंभीरता से नहीं लिया जाता, जब तक नजर से जुड़ी कोई परेशानी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित न करने लगे। विशेषज्ञों ने लोगों से नियमित आंखों की जांच कराने और आंखों की सेहत का ध्यान रखने वाली अच्छी आदतों को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाने की अपील की है। धुंधला दिखना, पढ़ने में परेशानी या रात में साफ न दिखना जैसे लक्षण नजर की समस्या का संकेत हो सकते हैं, लेकिन आंखों की कई गंभीर बीमारियां शुरुआत में बिना किसी स्पष्ट लक्षण के भी बढ़ सकती हैं।
डायबिटीज, लंबे समय तक स्क्रीन देखने की आदत और उम्र बढ़ना ऐसे प्रमुख कारण हैं, जिनकी वजह से नियमित आंखों की जांच जरूरी हो जाती है। डायबिटीज से पीड़ित लोगों को समय-समय पर आंखों की जांच करानी चाहिए, क्योंकि डायबिटिक रेटिनोपैथी शुरुआत में बिना किसी लक्षण के रेटिना की नसों को नुकसान पहुंचा सकती है। उम्र के साथ होने वाली कैटरेक्ट, ग्लूकोमा और एज रिलेटेड मैक्युलर डिजेनेरेशन जैसी बीमारियों की भी समय पर जांच और इलाज जरूरी है, ताकि नजर बनी रहे और लोग रोजमर्रा के कामों के लिए आत्मनिर्भर रहें।
डॉ. निखिल प्रजापति, सीनियर कंसल्टेंट - कैटरेक्ट एवं रिफ्रैक्टिव सर्जन, सेंटर फॉर साइट, गांधीनगर ने कहा, “अच्छी नजर को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए। आंखों की कई बीमारियां धीरे-धीरे बढ़ सकती हैं और व्यक्ति सामान्य रूप से पढ़ता, काम करता, गाड़ी चलाता और रोजमर्रा के काम करता रह सकता है। ग्लूकोमा, उदाहरण के लिए, धीरे-धीरे ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचा सकता है और एक बार नजर चली जाए तो उसे आमतौर पर वापस नहीं लाया जा सकता। इसी तरह डायबिटिक रेटिनोपैथी भी शुरुआत में नजर में कोई खास बदलाव किए बिना रेटिना को प्रभावित कर सकती है। इसलिए आंखों की जांच को सिर्फ चश्मे का नंबर पता करने वाली जांच नहीं समझना चाहिए। यह एक जरूरी हेल्थ चेकअप है, जिससे बीमारियों का समय पर पता लगाने और नजर को बचाने में मदद मिल सकती है।”
उम्र बढ़ने के साथ आंखों की देखभाल और भी जरूरी हो जाती है। कैटरेक्ट का प्रभावी इलाज संभव है, जबकि ग्लूकोमा और एज रिलेटेड मैक्युलर डिजेनेरेशन जैसी बीमारियों को समय पर पहचानने से उन्हें बेहतर तरीके से कंट्रोल करने में मदद मिल सकती है। अच्छी नजर बनी रहने से बुजुर्गों को आत्मनिर्भर रहने और रोजमर्रा के काम सुरक्षित तरीके से करने में मदद मिलती है।
डॉ. प्रजापति ने आगे कहा, “रोजमर्रा की आदतों का आंखों के आराम और लंबे समय तक आंखों की सेहत पर असर पड़ता है। कंप्यूटर और स्मार्टफोन पर लंबे समय तक काम करने से आंखों में सूखापन, थकान, सिरदर्द और आई स्ट्रेन हो सकता है। बीच-बीच में ब्रेक लेना, बार-बार पलकें झपकाना, स्क्रीन से सही दूरी रखना और पर्याप्त रोशनी में स्क्रीन का इस्तेमाल करना मददगार हो सकता है। बच्चों की आंखों पर खास ध्यान देना जरूरी है, क्योंकि वे कम उम्र से ही स्मार्टफोन, टैबलेट और दूसरी स्क्रीन के संपर्क में रहते हैं। बाहर खेलने और समय बिताने के मौके कम होने से मायोपिया का खतरा भी बढ़ सकता है। बच्चों को रोजाना कुछ समय बाहर बिताने और कम उम्र से ही आंखों की अच्छी आदतें अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना फायदेमंद हो सकता है।”
विशेषज्ञों ने लोगों से नजर में अचानक होने वाले बदलावों को नजरअंदाज न करने की भी सलाह दी है। अचानक नजर कम होना या धुंधला दिखना, आंखों के सामने चमक या नए फ्लोटर्स दिखाई देना, चीजें दो-दो दिखना, तेज दर्द या नजर के सामने पर्दे जैसी काली छाया दिखना ऐसे संकेत हैं, जिनमें तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। समय पर इलाज स्थायी नजर की कमी को रोकने में अहम भूमिका निभा सकता है।
आंखों की सेहत का शरीर की दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं से भी सीधा संबंध है। डायबिटीज और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखना, धूम्रपान से बचना, संतुलित खान-पान रखना और आंखों को ज्यादा अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाना लंबे समय तक आंखों की सेहत बनाए रखने में मदद कर सकता है।
8 अक्टूबर को मनाए जा रहे वर्ल्ड साइट डे 2026 की थीम “#LoveYourEyes” है। इसका संदेश साफ है, नजर सामान्य होने पर भी आंखों की सेहत को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। नियमित आंखों की जांच, स्क्रीन के इस्तेमाल में सावधानी और समय पर डॉक्टर से सलाह लेने से बीमारियों का जल्दी पता लगाने और लंबे समय तक आंखों की रोशनी बनाए रखने में मदद मिल सकती है।


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