बहादुरगढ़: कुछ साल पहले तक फैटी लिवर को युवाओं की समस्या नहीं माना जाता था, लेकिन आज 20–30 साल की उम्र में ही यह रूटीन चेक-अप के दौरान सामने आने लगा है। चिंता की बात यह है कि कई ऐसे युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं जो पारंपरिक रिस्क फैक्टर्स में फिट नहीं बैठते। दरअसल, यह बदलाव अचानक नहीं है, बल्कि हमारी बदलती लाइफस्टाइल—काम करने के तरीके, खाने की आदतें और आराम के पैटर्न—का नतीजा है।
आज की दिनचर्या देखने में भले ही प्रोडक्टिव और “नॉर्मल” लगे, लेकिन शरीर की जरूरतों के हिसाब से यह संतुलित नहीं होती। लोग अक्सर समय पर खाना छोड़ देते हैं, लंबे समय तक बैठे रहते हैं, देर रात तक जागते हैं और लगातार स्क्रीन पर व्यस्त रहते हैं। ये आदतें अलग-अलग देखने पर हानिकारक नहीं लगतीं, लेकिन जब ये रोज़मर्रा का हिस्सा बन जाती हैं, तो शरीर के ऊर्जा संतुलन पर असर डालती हैं।
मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, शालीमार बाग के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. पीयूष गुप्ता ने बताया “फैटी लिवर के पीछे एक बड़ी वजह “इनविज़िबल मेटाबॉलिक स्ट्रेस” है, जो धीरे-धीरे बढ़ता है और शुरुआत में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं देता। अनियमित खाना, बिना भूख के बार-बार स्नैकिंग, खाने का गलत समय और काम व आराम के बीच संतुलन की कमी—ये सभी कारण शरीर के मेटाबॉलिज़्म को प्रभावित करते हैं। ऐसे में लिवर, जो शरीर की ऊर्जा को मैनेज करता है, अतिरिक्त ऊर्जा को फैट के रूप में जमा करने लगता है। सिर्फ क्या खाया जा रहा है, यह ही नहीं बल्कि कब और कैसे खाया जा रहा है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। देर रात खाना, दिनभर भूखे रहकर एक बार में ज्यादा खाना, बार-बार बाहर से ऑर्डर करना या स्क्रीन देखते हुए खाना—ये सभी आदतें शरीर के नेचुरल रिदम को बिगाड़ देती हैं। धीरे-धीरे इससे लिवर में फैट जमा होने की संभावना बढ़ जाती है।“
इसके साथ ही आज का वर्क कल्चर भी एक बड़ी वजह है। युवा प्रोफेशनल्स दिन में 8 से 12 घंटे तक बैठे रहते हैं। भले ही कुछ लोग एक्सरसाइज करते हों, लेकिन लगातार बैठने से होने वाले नुकसान की भरपाई नहीं हो पाती। शरीर को नियमित मूवमेंट की जरूरत होती है, और जब यह कम हो जाती है, तो शरीर ऊर्जा को खर्च करने के बजाय स्टोर करने लगता है।
डॉ. पीयूष ने आगे बताया “नींद की अनियमितता भी इस समस्या को बढ़ाती है। देर रात तक जागना, सप्ताह के अलग-अलग दिनों में अलग-अलग स्लीप शेड्यूल और स्क्रीन की वजह से खराब नींद—ये सभी फैक्टर्स शरीर की इंटरनल क्लॉक को प्रभावित करते हैं। इसका सीधा असर मेटाबॉलिज़्म पर पड़ता है और लिवर पर अतिरिक्त दबाव बनता है। आज की लाइफस्टाइल में लगातार रहने वाला हल्का लेकिन स्थायी स्ट्रेस भी एक अहम भूमिका निभाता है। काम का दबाव, लगातार आने वाले नोटिफिकेशन और सोशल एक्सपेक्टेशंस मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं जिसमें शरीर हमेशा तनाव की स्थिति में रहता है। यह न सिर्फ खाने और सोने की आदतों को प्रभावित करता है, बल्कि शारीरिक एक्टिविटी की इच्छा भी कम कर देता है।
सुविधा को प्राथमिकता देने वाली आदतें भी इस समस्या को बढ़ा रही हैं। फूड डिलीवरी ऐप्स पर निर्भरता, अनियमित दिनचर्या और घर के खाने में कमी से जीवन में स्थिरता खत्म हो रही है, जबकि शरीर को सही तरीके से काम करने के लिए नियमितता की जरूरत होती है।
कई युवा जल्दी स्वतंत्र हो जाते हैं, लेकिन हेल्थ के प्रति जागरूकता उतनी नहीं होती। बिना किसी निगरानी के अनियमित दिनचर्या और सुविधा-आधारित फैसले आम हो जाते हैं। जब तक कोई लक्षण दिखाई नहीं देता, तब तक हेल्थ को प्राथमिकता नहीं दी जाती, जबकि अंदरूनी बदलाव पहले ही शुरू हो चुके होते हैं।
डॉ. पीयूष ने आगे बताया “वीकेंड लाइफस्टाइल भी इस असंतुलन को और बढ़ा देती है। सप्ताह के दिनों की थोड़ी-बहुत नियमितता, वीकेंड पर देर रात तक जागने, अनियमित खाने और कम शारीरिक गतिविधि के कारण टूट जाती है। यह चक्र हर हफ्ते दोहराया जाता है, जिससे शरीर को स्थिर होने का मौका नहीं मिलता। डिजिटल डिपेंडेंसी ने भी इस समस्या को बढ़ाया है। लंबे समय तक स्क्रीन पर रहना, आउटडोर एक्टिविटी में कमी, बिना सोचे-समझे खाना और देर रात तक मोबाइल का उपयोग—ये सभी आदतें मेटाबॉलिक हेल्थ को प्रभावित करती हैं। भारत में यह समस्या ज्यादा तेजी से इसलिए बढ़ रही है क्योंकि यहां तेज़ रफ्तार वाली जिंदगी, प्रोसेस्ड फूड की बढ़ती उपलब्धता, देर रात तक जागने की संस्कृति और कम होती शारीरिक गतिविधि जैसे फैक्टर्स एक साथ काम कर रहे हैं। इसके अलावा, भारतीयों में जेनेटिक रूप से मेटाबॉलिक समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता भी ज्यादा होती है, जिससे यह समस्या कम उम्र में ही सामने आने लगती है।“
फैटी लिवर के शुरुआती लक्षण अक्सर बहुत हल्के होते हैं और नजरअंदाज हो जाते हैं, जैसे बिना कारण थकान महसूस होना, खाने के बाद भारीपन, रोज़मर्रा के कामों में जल्दी थक जाना या दिनभर ऊर्जा का स्थिर न रहना। लोग इसे आमतौर पर व्यस्त दिनचर्या का हिस्सा मान लेते हैं।
इस स्थिति से निपटने के लिए बड़े बदलावों की नहीं, बल्कि संतुलन लौटाने की जरूरत है। नियमित समय पर खाना, दिनभर में थोड़ी-थोड़ी शारीरिक गतिविधि शामिल करना, अच्छी और नियमित नींद लेना, सुविधा-आधारित आदतों पर निर्भरता कम करना और काम व आराम के बीच स्पष्ट सीमा बनाना—ये छोटे लेकिन प्रभावी कदम हैं।
अंत में, युवाओं में बढ़ता फैटी लिवर किसी एक कारण का परिणाम नहीं है, बल्कि रोज़मर्रा की कई छोटी-छोटी आदतों के बदलाव का संयुक्त प्रभाव है। असली चिंता सिर्फ बीमारी नहीं, बल्कि इसकी कम उम्र में शुरुआत है। सही समय पर इन पैटर्न्स को समझकर और सुधारकर, लंबे समय तक लिवर और ओवरऑल हेल्थ को सुरक्षित रखा जा सकता है।

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