प्रयागराज: प्रोस्टेट पुरुषों में मूत्राशय और मूत्रमार्ग के बीच स्थित अखरोट के आकार की एक छोटी ग्रंथि होती है, जो वीर्य द्रव (सीमेन) के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह द्रव शुक्राणुओं को पोषण देने और उनके परिवहन में मदद करता है। हालांकि आकार में छोटी होने के बावजूद प्रोस्टेट से जुड़ी बीमारियां पुरुषों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकती हैं। भारत में प्रोस्टेट संबंधी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन जागरूकता की कमी और झिझक के कारण कई पुरुष शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं।
प्रोस्टेट से जुड़ी प्रमुख बीमारियों में प्रोस्टेटाइटिस, बेनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया (बीपीएच) और प्रोस्टेट कैंसर शामिल हैं। प्रोस्टेटाइटिस प्रोस्टेट ग्रंथि में होने वाली सूजन है, जो अक्सर बैक्टीरियल संक्रमण के कारण होती है। यह समस्या आमतौर पर युवा और मध्यम आयु वर्ग के पुरुषों में देखी जाती है। इसके लक्षणों में पेशाब करते समय दर्द या जलन, पेल्विक क्षेत्र में दर्द, बार-बार पेशाब आना, बुखार, ठंड लगना तथा धुंधला या असामान्य रंग का पेशाब शामिल हो सकता है। समय पर इलाज मिलने पर यह स्थिति आमतौर पर एंटीबायोटिक दवाओं से नियंत्रित की जा सकती है।
मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत के यूरोलॉजी, किडनी ट्रांसप्लांट, रोबोटिक्स एवं यूरो-ऑन्कोलॉजी विभाग के कंसल्टेंट डॉ. करनदीप गुलेरिया ने बताया ”बेनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया (बीपीएच) प्रोस्टेट का गैर-कैंसरकारी बढ़ाव है, जो उम्र बढ़ने के साथ अधिक सामान्य हो जाता है। 60 वर्ष की आयु तक लगभग आधे पुरुष किसी न किसी स्तर पर इस समस्या से प्रभावित हो सकते हैं। प्रोस्टेट के बढ़ने से मूत्रमार्ग पर दबाव पड़ता है, जिससे पेशाब की धार कमजोर होना, पेशाब शुरू करने में कठिनाई, बार-बार विशेषकर रात में पेशाब आना और मूत्राशय पूरी तरह खाली न होने का एहसास जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। यदि इसका उपचार न किया जाए तो मूत्र रुक जाना, मूत्राशय में पथरी, संक्रमण और यहां तक कि किडनी को नुकसान जैसी जटिलताएं भी हो सकती हैं। बढ़ती उम्र, हार्मोनल बदलाव, सूजन और पारिवारिक इतिहास इसके प्रमुख कारण माने जाते हैं। अधिकांश मरीजों में दवाओं के माध्यम से सफलतापूर्वक उपचार किया जा सकता है, जबकि गंभीर मामलों में सर्जरी की आवश्यकता पड़ सकती है।“
प्रोस्टेट कैंसर भारत में पुरुषों में पाए जाने वाले सबसे आम कैंसरों में से एक है और फेफड़ों तथा मुंह के कैंसर के बाद पुरुषों में तीसरा सबसे सामान्य कैंसर माना जाता है। यह बीमारी मुख्य रूप से 65 वर्ष से अधिक आयु के पुरुषों में देखी जाती है, लेकिन हाल के वर्षों में कम उम्र के शहरी पुरुषों में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं। बढ़ती उम्र, आनुवंशिक कारण, मोटापा और अस्वस्थ जीवनशैली इसके प्रमुख जोखिम कारक हैं।
डॉ. करनदीप ने आगे बताया “प्रोस्टेट कैंसर की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शुरुआती चरण में पहचान होने पर इसका सफलतापूर्वक इलाज संभव है। अधिकांश प्रोस्टेट कैंसर धीरे-धीरे बढ़ते हैं, इसलिए नियमित जांच से बीमारी का पता समय रहते लगाया जा सकता है। यूरोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया 50 वर्ष की आयु के बाद नियमित स्क्रीनिंग कराने की सलाह देती है, विशेषकर उन पुरुषों को जिनकी जीवन प्रत्याशा 10 से 15 वर्ष या उससे अधिक हो। स्क्रीनिंग के लिए पीएसए (प्रोस्टेट स्पेसिफिक एंटीजन) रक्त जांच और डिजिटल रेक्टल एग्जामिनेशन (डीआरई) प्रमुख परीक्षण हैं। पीएसए का बढ़ा हुआ स्तर सूजन, प्रोस्टेट के बढ़ने या कैंसर की संभावना का संकेत दे सकता है, जबकि डीआरई के माध्यम से डॉक्टर प्रोस्टेट की असामान्यताओं का आकलन करते हैं।“
प्रोस्टेट कैंसर का उपचार रोग की अवस्था, मरीज की उम्र और समग्र स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। उपचार विकल्पों में नियमित निगरानी (एक्टिव सर्विलांस), रोबोटिक रेडिकल प्रोस्टेटेक्टॉमी, रेडियोथेरेपी

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